मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया Class 10th Samajik Vigyan (RCSCE Question Bank Complete Solution)

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न:

1. मुद्रण की सबसे पहली तकनीक किस देश में प्रारंभ हुई?

(अ) भारत (ब) जर्मनी (स) चीन (द) जापान ( )

2. गंभीर हिन्दी छपाई की शुरूआत किस दशक में हुई?

(अ) 1920 (ब) 1870 (स) 1850 (द) 1860 ( )

3. जापान की सबसे पुरानी पुस्तक ‘‘डायमण्ड सूत्र’’ कब छपी-

(अ) 1018 (ब) 908 (स) 968 (द) 868 ( )

4. आधुनिक छापेखाने का आविष्कार किसने किया?

(अ) मार्कोपोलो (ब) योहान गुटेनबर्ग (स) दिदरो (द) इरैस्मस ( )

5. तुलसीदास कृत रामचरित मानस का पहला मुद्रित संस्करण कहाँ प्रकाशित हुआ?

(अ) बनारस (ब) इलाहाबाद (स) हरिद्वार (द) कलकत्ता ( )

6. ‘‘गुलामगिरी’’ पुस्तक के लेखक कैन थे?

(अ) महात्मा गांधी (ब) ज्योतिबा फूले

(स) बी.आर. अम्बेडकर (द) गोपाल कृष्ण गोखले ( )

उत्तर:- 1. स, 2. ब, 3. द, 4. ब, 5. द, 6. ब

रिक्त स्थानों की पूर्ति  करो –

1. धर्म सुधारक …………………………………… जिसने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुये

अपनी पिच्चानवें स्थापनाएँ लिखी।। (मार्टिन लूथर)

2. भारत में प्रिटिंग प्रेस सर्वप्रथम …………………………………… में पुर्तगाली धर्म प्रचारकों के साथ आई। (गोवा)

अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

भारत में सबसे पहली प्रिंटिंग प्रेस संस्थान 1556 में गोवा में स्थापित की गई थी। यह प्रेस भारत में पुर्तगाली भाषा में पुस्तकों को मुद्रित करने के लिए शुरू की गई थी।

“बंगाल” नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन 1861 में बंगाल विधानसभा के सदस्य और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी शशि भूषण चट्टोपाध्याय द्वारा किया गया था।

मुद्रण क्रांति एक ऐतिहासिक घटना है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसका मुख्य उद्देश्य था ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय जनता को जागरूक करना और उन्हें स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देना।

जापान की सबसे पुरानी पुस्तक का नाम “कोजिकी” है, जो 712 ईसा पूर्व में छपी थी। यह पुस्तक जापानी साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें जापान के दावे और इतिहास के कई महत्वपूर्ण किस्से और कथाएं हैं।

कितगावा उतामारो एक जापानी फिल्म निर्माता और निर्देशक थे। उन्होंने कई महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया, जिसमें से कुछ नामी फिल्में “रशोमन”, “कागज़ के फूल”, “पथेर पांचली”, “मैगनिफिसेंट सेभन”, और “जागते रहो” शामिल हैं।

इंग्लैंड में सस्ती किताबों को “पेनी ड्रेडफुल्स” कहा जाता था। यह शब्द अंग्रेजी भाषा में “पेनी” (पैसा) और “ड्रेडफुल्स” (ड्रेड और भयानक) शब्दों का जुगालबंदी है, जिससे इसे कुछ खास प्रकार की सस्ती या उच्चारण अच्छे नहीं लगने वाली किताबों के लिए उपयोग किया जाता था।

“उलमा” एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है “ज्ञानी” या “विद्वान”। इस शब्द का उपयोग इस्लामिक सांस्कृतिक और धार्मिक संस्कृति में शिक्षकों, विद्वानों, और धार्मिक आदर्शों के प्रमुख प्रवक्ताओं और प्रशासकों के लिए किया जाता है।

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1878 का एक कानून था जो ब्रिटिश भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान करता था। इस एक्ट के अंतर्गत, सरकार को प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने और देश में असहमति के विरोध में लिखी गई किसी भी सामग्री को रोकने की अनुमति थी। यह एक्ट ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में आदिकाल से चली आ रही प्रेस की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास था। इस एक्ट का विरोध किया गया और इसे बाद में संशोधित करके प्रेस एक्ट, 1910 के रूप में पुनर्विचारित किया गया।

कम्पोजीटर (Compositor) एक व्यक्ति होता है जो प्रिंटिंग के काम के लिए मुद्रक में टाइपसेटिंग करता है। यह प्रक्रिया टाइपसेटिंग कहलाती है, जिसमें टाइपसेटर टाइप को लिनोटाइप, मोनोटाइप, या डायरेक्टली पेज के लिए इस्तेमाल होने वाली अन्य मुद्रण प्रक्रियाओं में लगातार ढंग से रखता है। यह प्रक्रिया अक्सर पुराने समयों में प्रचलित थी, लेकिन आजकल डिजिटल टाइपसेटिंग के कारण इसका प्रयोग कम हो गया है।

निरंकुशवाद (Anarchism) एक विचारात्मक और सामाजिक सिद्धांत है जो सरकार और अधिकार के विरुद्ध है। यह विश्वास करता है कि समाज को स्वतंत्रता, समानता, और विचार की स्वतंत्रता के माध्यम से संगठित करना चाहिए, और किसी भी प्रकार की सरकारी या अधिकारिक शक्ति को अवरुद्ध करना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुयायी निरंकुशवादी कहलाते हैं और वे विश्वास करते हैं कि समाज की सभी जरूरतें स्वतंत्रता और स्वायत्तता के माध्यम से हल की जा सकती हैं।

धातुई फ्रेम, जिसमें टाइप बिछाकर इबारत बनाई जाती थी

लघुत्तरात्मक प्रश्न

छापेखाने के आविष्कार ने सामाजिक विचारधारा में बदलाव किया। लोग अब आसानी से जानकारी प्राप्त कर सकते थे, जिससे समाज में सुधार हुआ और विचारशीलता बढ़ी। इस प्रकार, छापेखाने के आविष्कार ने लेखन कला और ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मनुष्य के बौद्धिक विकास को प्रोत्साहित किया।

चूंकि 700 और 1750 के बीच की अवधि के दौरान कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं थी, इसलिए शास्त्री हाथ से लिखी पांडुलिपियों की प्रतिलिपि बनाते थे। कभी-कभी मूल लिपि को पहचानना कठिन होता था। इसलिए शास्त्रियों ने तथ्यों की व्याख्या करने के लिए अपने तरीके का इस्तेमाल किया। परिणामस्वरूप, विभिन्न शास्त्रियों द्वारा लिखी गई प्रतियों में अंतर पाया गया। चूंकि सभी प्रतियां हस्तलिखित थीं, इसलिए यह पहचानना मुश्किल था कि कौन सी मूल प्रति है। यह ऐसी नकल का दोष था।

मुद्रित किताबों का अधिकतर लोगों से स्वागत किया, लेकिन कुछ लोगों के मन में भय था कि अगर छपे हुए और पढ़े जा रहे पर कोई नियंत्रण न होगा तो लोगों में बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे। अगर ऐसा हुआ तो ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी।

ज्योतिबा फुले भारतीय समाज के जातिभेद और जातिवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले महान समाजसेवी और कार्यकर्ता थे। उन्होंने भारतीय समाज में जातिभेद के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आंदोलन चलाया, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में समानता, न्याय और अधिकार के लिए लड़ना था। ज्योतिबा फुले ने मुख्य रूप से महाराष्ट्र में जातिभेद के खिलाफ आंदोलन चलाया, जिसमें उन्होंने दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को समाज में समानता और न्याय के लिए जागरूक किया। उन्होंने समाज में शिक्षा के लिए समान अधिकार की मांग की और विशेषकर दलितों की शिक्षा को लेकर महत्वपूर्ण कदम उठाए। ज्योतिबा फुले ने महिलाओं के शिक्षा को भी प्रोत्साहित किया और समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए काम किया। उन्होंने एक समाजसेवी संस्था “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की, जो समाज में समाजिक बदलाव लाने के लिए काम करती है। ज्योतिबा फुले का योगदान भारतीय समाज में समाजिक न्याय और समानता की दिशा में अद्वितीय रहा है।

लघुत्तरात्मक प्रश्न-

पाण्डुलिपियों उस दस्तावेज को कहते हैं जो एक व्यक्ति या अनेक व्यक्तियों द्वारा हाथ से लिखी गयी हो। जैसे हस्तलिखित पत्र। भारत में छापाखाना के विकास के पहले हाथ से लिख कर पाण्डुलिपि को तैयार करने की एवं समृद्ध परंपरा थी।  छापाखाना के आविष्कार से पूर्व पाण्डुलिपि का उपयोग भोज-पत्रों किताबों आदि को लिखने के लिए होता था। सबसे पुरानी लिखित पांडुलिपियाँ मध्य पूर्व में उनके विश्राम स्थलों के पूरी तरह सूखने से संरक्षित हैं, चाहे उन्हें मिस्र के कब्रों में ताबूत के अंदर जमा किया गया हो या ममी-लपेटने के रूप में पुन: उपयोग किया गया हो, ऑक्सिरहिन्चस के बीच में छोड़ दिया गया हो या जार में स्रावित किया गया हो और सुरक्षित रखने के लिए दफन किया गया हो (नाग हम्मादी) पुस्तकालय) या सूखी गुफाओं (मृत सागर स्क्रॉल) में रखा गया।

1. इसने ज्ञानोदय के विचारों का प्रसार किया। इन्हें पढ़कर लोगों में नई चेतना जगी। मॉन्टेस्क्यू, वाल्तेयर और रूसो के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। 2. मुद्रण ने वादविवाद की संस्कृति का भी विकास किया। लोग अब परंपराओं और अंधविश्वासों को तर्क की कसौटी पर कसने लगे। 3. बुद्धिजीवियों ने निरंकुशवाद, दरबार की विलासिता एवं उसके नैतिक पतन को उजागर किया। इसने राजशाही के विरुद्ध असंतोष को बढ़ावा देकर क्रांति की भावना को बलवती बनाया।

(i)768-770 ई० में चीन के बौद्ध प्रचारकों ने जापान में हस्तमुद्रण प्रौद्योगिकी की स्थापना की थी।

(ii) जापान की प्राचीनतम 868 ई० में छपी पुस्तक डायमंड सूत्र है, जिसमें पाठ की छह शीटों के साथ-साथ काठ पर खुदे चित्र भी हैं।

(iii) चित्रों की छपाई के लिए ताश के पत्ते, कपड़े तथा कागज के नोटों को प्रयुक्त किया जाता था।

(iv) मध्यकालीन जापान में कवि भी छपते थे और गद्यकार भी। पुस्तकें सस्ती और सुलभ थीं।

(v) 18वीं सदी के अंत में एदो (बाद में जिसे तोक्यो के नाम से जाना गया) के शहरी क्षेत्र की चित्रकारी में शालीन संस्कृति का पता मिलता है जिसमें हम कलाकारों, वेश्याओं तथा चायघर में मीटिंगों को देख सकते हैं।

यूरोप (Europe) में पुस्तकों के प्रकाशन से नई राजनीतिक एवं धार्मिक मान्यता का विकास हुआ। धर्म-विरोधी विचारों के प्रसार को रोकने के लिए रोमन चर्च ने इन्क्वीजीशन (Inquisition) का गठन किया। यह एक प्रकार का धार्मिक न्यायालय (Religious Court) था। इसका कार्य धर्म-विरोधियों की पहचान कर उन्हें दंडित करना था। इटली के मेनोकियो ने जब बाइबिल और उसके उपदेशों की नई व्याख्या की, तो उसे मृत्युदंड दिया गया।

19वीं सदी में यूरोप में नए पाठक वर्ग का निर्माण कई कारणों से हुआ, जिनमें से कुछ मुख्य हैं: इस समय शिक्षा का प्रसार विशाल रूप से बढ़ा, जिससे अधिक लोगों ने पढ़ाई की अवसर पाए। प्रिंटिंग प्रेस की खोज के बाद, पुस्तकों की प्रकाशन आसान हो गई, जिससे जनमानस में पुस्तकों की मांग बढ़ी। यूरोप में औद्योगिक क्रांति, राष्ट्रीयकरण, और औद्योगिकीकरण के कारण सामाजिक परिवर्तन हुए, जिससे नये पाठक वर्ग की उत्पत्ति हुई। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ने भी नए विचारों और अनुभवों की ओर लोगों को आकर्षित किया। समाज में सुधार के लिए लड़ने वाले संगठनों ने भी जनता को पुस्तकों और विचारों से अवगत किया।

निबन्धात्मक प्रश्न

मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में सहायता – मुद्रण शक्ति संस्कृति ने भारत के लोगों में एक नयी प्रकार की राजनीतिक चितना को जागकर भारत में राष्ट्रवाद की गति को तीव्रता प्रदान की और भारत की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।

भारतीय प्रेस ने भी राष्ट्रीय भावनाओं को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैलाने में बड़ा पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को शक्तिशाली बनाने में सराहनीय कार्य किया।

मुद्रण संस्कृति के प्रभावधीन जो भारत में साहित्य का सृजन हुआ, उसने भी राष्ट्रवाद के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ब्रिटिश काल में जो साहित्य लिखा गया उसका एक बड़ा भाग अंग्रेजी साम्राज्य के अवगुणों को प्रकट करने, पश्चिमी दार्शनिक तथा राजनीतिज्ञों के विचार भारती लोगों तक पहुँचाने, प्राचीन भारतीय सभ्यता के उच्चतम पहलुओं को लोगों के सामने लाने तथा भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना भरने के लिए हुआ। भारतीय लेखकों ने इस देश की दुर्दशा का चित्रण करके तथा दूसरे स्वतन्त्र देशों से तुलना करके लोगों के मन में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जोश भर दिया। इसी प्रकार जब विदेशी जातियों का पराधीनता के विरुद्ध किया जाने वाला संघर्ष भारतीयों के सामने आया तो उनके मन में भी अग्रजों के विरुद्ध संघर्ष करने की इच्छा उत्पन्न हुई। अपनी प्राचीन भारतीय सभ्यता की महानता को देखकर भारत के लोगों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की भावनाएँ जागृत हो गयीं। इन सब कारणों ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को उत्तेजित करने में बड़ा भाग लिया।

मध्यवर्गीय घरों की महिलाएँ पहले से ज्यादा पढ़ने लगीं। 19वीं सदी के मध्य में छोटे-बड़े शहरों में स्कूल बने तो उदारवादी पिता और पति महिलाओं को पढ़ने के लिए भेजने लगे।

(क) भारत के शहरों में काफी सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर बेची जाने लगी थीं, जिसके कारण गरीब लोग भी बाजार से उन्हें खरीदने लगे।

(ख) उन्नीसवीं सदी के अंत तक जाति भेद के बारे में तरह-तरह की पुस्तिकाओं और निबंधों में लिखा जाने लगा था।

(ग) ‘निम्न-जातीय’ आंदोलनों में मराठी प्रणेता ज्योतिबा फुले ने अपनी “गुलामगिरी” (1871) में जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा।

(घ) ऊँच-नीच, जात-पात एवं धर्म पर लिखे जाने वाले लेख अब भारत की गरीब जनता पढ़ने लगी। परिणामस्वरूप स्थानीय विरोध आंदोलनों और संप्रदायों ने भी प्राचीन धर्मग्रंथों की आलोचना करते हुए एक नए और न्यायपूर्ण समाज का सपना बुनने लगे।

महिलाओं के जीवन और संवेदनाओं पर कई लेखकों ने लिखना शुरु किया। इसके कारण मध्यम वर्ग की महिलाओं में पढ़ने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी। कई ऐसे पिता या पति आगे आये जो स्त्री शिक्षा पर जोर देते थे। कुछ महिलाओं ने घर पर रहकर ही शिक्षा प्राप्त की, जबकि कुछ अन्य महिलाओं ने स्कूल जाना भी शुरु किया। लेकिन पुरातनपंथी हिंदू और मुसलमान अभी भी स्त्री शिक्षा के खिलाफ थे। उनका मानना था कि शिक्षा से लड़कियों के दिमाग पर बुरे प्रभाव पड़ेंगे। लोग चाहते थे कि उनकी बेटियाँ धार्मिक ग्रंथ पढ़ें लेकिन उसके अलावा और कुछ न पढ़ें।

कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने गरीबों के लिए मुफ्त पुस्तकें प्रकाशित की। यह पुस्तकें उन्हें मुफ्त में प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करती थीं। गरीबों के लिए सस्ती या मुफ्त ग्रंथालय स्थापित किए गए जिससे उन्हें पुस्तकों का आसानी से उपयोग करने का मौका मिलता था। कुछ सामाजिक संस्थाएं और समाजसेवी व्यक्तियों ने गरीबों के लिए पुस्तकें प्राप्त करने और पढ़ने के लिए सहायता प्रदान की। कुछ सामाजिक आंदोलनों ने गरीबों के लिए शिक्षा और पुस्तकें मुहैया कराने की मांग की और इसके लिए काम किया।

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