औद्योगीकरण का युग Class 10th Samajik Vigyan (RCSCE Question Bank Complete Solution)

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम किस देश में प्रारंभ हुई?

(अ) जर्मनी (ब) जापान (स) अमेरिका (द) इंग्लैण्ड ( )

2. भारत का प्रथम लोह व इस्पात संयंत्र स्थापित किया गया-

(अ) कानपुर-दिनशा पेटिट (ब) हुगली-द्वारकानाथ टेगोर

(स) रांची-हुकुमचन्द (द) जमशेदजी-टाटा ( )

3. स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किसने किया?

(अ) स्टीफेन्सन (ब) जेम्स हारग्रीव्ज (स) जान के (द) आर्कटाइन ( )

4. मुम्बई में पहली कपड़ा मिल स्थापित हुई –

(अ) 1804 (ब) 1816 (स) 1854 (द) 1855 ( )

5. बंगाल में पहली जूट मिल स्थापित हुई –

(अ) 1854 (ब) 1865 (स) 1815 (द) 1855 ( )

उत्तर:- 1. द, 2. द, 3. ब, 4. स, 5. द

रिक्त स्थानों की पूर्ति  करो

1. …………………………………… नये युग का पहला प्रतीक थी। (कपास)

2. बच्चों की चीजों का प्रचार करने के लिये …………………………………… की छवि का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता था। (बाल कृष्ण)

अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

1. भाप के इंजन का आविष्कार किसने किया?   

भाप के इंजन का आविष्कार जेम्स वॉट के द्वारा किया गया था। उन्होंने 1769 में पहला सफल भाप इंजन बनाया था

2. पश्चिम नजरिये से ‘‘प्राच्य’’ का क्या आशय है?

पश्चिमी दृष्टिकोण से “प्राच्य” शब्द का आशय विभिन्न है, लेकिन सामान्यत: इसका अर्थ “पूर्व” या “पूर्वाचल” से संबंधित है। यह शब्द विशेषत: पश्चिमी देशों में पूर्वी या पूर्वाचलीय संस्कृतियों, विचारधाराओं, या वस्तुओं को संकेतित करने के लिए प्रयुक्त होता है। इसका उपयोग किसी भी दृष्टिकोण से किया जा सकता है, जैसे कि साहित्य, कला, संस्कृति, और ऐतिहासिक प्रदर्शनों में। इसका उपयोग भाषा, साहित्य, धर्म, कला, और विज्ञान में पूर्वी संस्कृतियों की अध्ययन या समझ के लिए भी किया जाता है।

3. ‘गिल्ड्स’ से आप क्या समझते है?

व्यापारियों द्वारा अपने हितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए व्यापार संघों को गिल्ड कहा जाता था।

4. भारत के किन्हीं चार प्रारंभिक उद्योगपतियों के नाम लिखिए?

जगदीश चंद्र महिंद्रा

जमशेदजी टाटा

जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा

जी आर गोपीनाथ

5. भारतीय उद्योगों के संदर्भ में ‘‘जावीर’’ की क्या भूमिका थी?

‘जावीर’ (Jawahar Rojgar Yojana) एक ऐसी योजना थी जिसने भारतीय उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह योजना 1989 में प्रारंभ हुई थी और उस समय के उद्यमिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।

इस योजना के अंतर्गत, उद्यमिता को विभिन्न तरह की सरकारी सहायता प्रदान की गई, जैसे कि वित्तीय सहायता, तकनीकी सहायता, और प्रशिक्षण। इसका मुख्य उद्देश्य था छोटे और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहित करना और नौकरियों के स्थापना में मदद करना। जावीर योजना ने उद्योग विकास को गति देने में मदद की और उद्यमिता को समर्थन प्रदान किया जिससे वे अपने व्यवसाय को सफल बना सकें।

6. स्टेपलर्स से क्या अभिप्राय है?

इतिहास में स्टेपलर वे लोग थे जो ऊन को उसके रेशे और गुणवत्ता के अनुसार स्टेपल या वर्गीकृत करते थे। एक ऊन स्टेपलर अपना ऊन एक कपड़ा व्यापारी को बेचता है जो कपड़े का विपणन करता है, पहले पूंजी निवेश करता है और फाइबर खरीदता है।

7. गुमाश्ता कौन थे?

गोमास्थ वे सवेतन सेवक थे जिन्हें बुनकरों की देखरेख, आपूर्ति एकत्र करने और कपड़े की गुणवत्ता की जांच करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त किया गया था। फारसी में ‘गोमास्थ’ शब्द का अर्थ है एजेंट।

8. भारत की पहली कपड़ा मिल कब आर कहाँ स्थापित हुई?

भारत की पहली सूती मिल बंबई में स्थापित की गई थी। बंबई में स्थापित होने वाली पहली सूती मिल बॉम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी थी। इसकी स्थापना 7 जुलाई 1853 को कावसजी नानाभाई दावर ने और उनके सहयोगियों ने ताड़देव में की थी। सर विलियम फेयरबेयर ने इस कंपनी को डिजाइन किया और उत्पादन 1856 में शुरू किया गया।

लघुत्तरात्मक प्रश्न

1. उद्योगों में मौसमी आधार पर काम करने वाले कामगारों की स्थिति पर प्रकाश डालिए?

मौसमी आधार पर काम करने वाले कामगारों की स्थिति अक्सर अस्थिर होती है और उनके जीवन पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव पड़ सकते हैं। ये कामगार विभिन्न उद्योगों में काम करते हैं जैसे कि कृषि, निर्माण, और अन्य उद्योगों में।

1. **कृषि में:** मौसमी आधार पर काम करने वाले कृषि कामगारों की स्थिति अत्यधिक अस्थिर होती है। उन्हें उत्पादन की सीमित अवधि में काम करना पड़ सकता है और अचानक के मौसमी परिवर्तनों से प्रभावित हो सकते हैं।

2. **निर्माण में:** मौसमी आधार पर काम करने वाले निर्माण कामगारों की स्थिति भी अस्थिर हो सकती है। उनका काम आधारित होता है उत्पादन की स्थिति पर, जो मौसम के परिवर्तनों के कारण बदल सकती है।

3. **औद्योगिक क्षेत्र में:** मौसमी आधार पर काम करने वाले कामगारों की स्थिति उद्योगों में भी महत्वपूर्ण है। उनका काम उत्पादन की गति पर निर्भर हो सकता है, जो मौसम के परिवर्तनों के कारण अस्थिर हो सकती है।

इन सभी क्षेत्रों में, मौसमी आधार पर काम करने वाले कामगारों की आर्थिक स्थिति अस्थिर हो सकती है और उन्हें सुरक्षित और सुगम माहौल में काम करने की संभावना कम हो सकती है।

2. जॉबर कौन होते थे? उनके कार्यों को स्पष्ट कीजिए?

जॉबर कोई पुराना और विश्ववस्त कर्मचारी होता था। वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, उन्हें शहर में जमने के लिए मदद करता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था । जॉबर मजबूत और ताकतवर बन गया था । वह मदद के बदले पैसे और तोहफे की माँग करने लगा था और मजदूरों की जिन्दगी नियंत्रित करने लगा था ।

3. फ्लांइग शटल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए?

फ्लाइंग शटल, मशीन जो स्वचालित बुनाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करती है। इसका आविष्कार 1733 में John Kay द्वारा किया गया था। पिछले करघों में, शटल को हाथ से धागों के माध्यम से फेंका या पास किया जाता था, और चौड़े कपड़ों के लिए दो बुनकरों को एक साथ बैठकर शटल को पास करना पड़ता था।

4. बाजार में श्रम की प्रचुरता के मजदूरों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?

क) श्रम की प्रचुरता थी, इसलिए मजदूरी कम थी। (ख) हाथ श्रम ने बड़े पैमाने पर बाजार के लिए समान और मानकीकृत सामान का उत्पादन किया। (ग) मशीनों को भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता थी। (घ) उद्योग, जहां मांग मौसमी थी, उद्योगपतियों ने हाथ श्रम को प्राथमिकता दी

5. स्पिनिंग जेनी से आप क्या समझते है?

स्पिंनिंग जेनि एक बहु-धुरी कताई फ्रेम है, और प्रारंभिक औद्योगिक क्रांति के दौरान कपड़ा निर्माण के औद्योगीकरण में प्रमुख विकासों में से एक था। स्पिनिंग जेनी का आविष्कार जेम्स हरग्रीव्ज ने 1764 या 1765 ईं किया था, जिससे एक साथ सूत के 8 धागे काटे जा सकते थे।

6. औद्योगीकरण के प्रारंभिक दौर में क्या परिवर्तन आये?

उत्पादन में वृद्धि से वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ी। उत्पादन में वृद्धि से निर्यात में वृद्धि। स्वतंत्र कारीगर कारखानों से प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सके, फलत: कुटीर उद्योग समाप्त हो गए। बड़े-बड़े कृषि फार्मों की स्थापना के कारण छोटे किसानों को रोज़गार की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर जाना पड़ा।

लघुत्तरात्मक प्रश्न-

1. बुनकरों और गुमाश्तों के बीच टकराव की स्थिति का क्या प्रभाव पड़ा?

ब्रिटिश कंपनी ने बुनकरों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने के लिए मौजूदा व्यापारियों और दलालों को समाप्त कर दिया। कंपनी ने बुनकरों की निगरानी करने, आपूर्तिकर्ताओं को इकट्ठा करने और कपड़े की गुणवत्ता की जांच करने के लिए गोमास्थस नामक एक वेतनभोगी नौकर को नियुक्त किया। 2.एक बार ऑर्डर मिलने के बाद, बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण दिया जाता था। जिन लोगों ने ऋण लिया था, उन्हें कपड़े केवल गुमाश्ताओं को ही सौंपने चाहिए। 3. गुमाश्ताओं को बाहरी माना जाता था। उनका गाँवों से कोई सामाजिक जुड़ाव नहीं था। 4. बुनकरों को अपना काम पूरा करने के लिए कम समय दिया गया। यदि वे समय पर काम करने में विफल रहे, तो गुमाश्ता सिपाहियों और चपरासियों के साथ गाँव में घुस गए। 5. गुमाश्ता बहुत अहंकारी होते हैं। 6. उन्होंने काम में देरी के लिए बुनकरों को दंडित किया। इसलिए उपरोक्त कारण से यहां भारतीय बुनकरों और गुमाश्ताओं के बीच संघर्ष होता है।

2. बीसवीं सदी के प्रथम दशक तक भारत में औद्योगीकरण की व्यवस्था में आए परिवर्तनों का वर्णन कीजिए?.

बीसवीं सदी के प्रथम दशक तक भारत में औद्योगीकरण की व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। इस अवधि को देखते हुए, हम ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रभाव में भारतीय अर्थव्यवस्था के बदलाव को समझ सकते हैं। औद्योगीकरण के इस दौर में आए मुख्य परिवर्तन निम्नलिखित हैं:

औद्योगिक आरम्भिक चरण: बीसवीं सदी के आरंभ तक, भारत में औद्योगीकरण की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन यह बहुत सीमित स्तर पर था। जूट, कपास की मिलें और लौह एवं इस्पात उद्योग के कुछ आरंभिक संस्थान शुरू हुए थे।

बुनियादी ढांचे का विकास: ब्रिटिश राज ने रेलवे लाइनों, सड़कों और बंदरगाहों का निर्माण किया, जिससे माल की आवाजाही आसान हुई और बाजार तक पहुँच में सुधार हुआ। यह बुनियादी ढांचे का विकास औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल था।

कपास उद्योग में वृद्धि: भारतीय कपास उद्योग ने इस अवधि में तेजी से विकास किया, विशेष रूप से मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) और अहमदाबाद में। यह वृद्धि अमेरिकी गृहयुद्ध (1861-1865) के दौरान और उसके बाद भी देखी गई थी, जब ब्रिटेन के लिए अमेरिकी कपास की आपूर्ति में व्यवधान आया।

जूट उद्योग का उदय: बंगाल के कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) के आसपास जूट उद्योग ने भी महत्वपूर्ण विकास किया। यूरोपीय बाजारों में जूट की बढ़ती मांग के कारण यह उद्योग फला-फूला।

विदेशी निवेश: ब्रिटिश कंपनियों और उद्योगपतियों ने भारतीय उद्योगों में निवेश किया, जिससे औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिला। हालांकि, इससे भारतीय उद्योगों पर ब्रिटिश नियंत्रण भी बढ़ा।

शिल्प उद्योगों पर प्रभाव: औद्योगीकरण और ब्रिटिश आर्थिक नीतियों ने पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव डाला। कई हस्तशिल्प उद्योग संकुचित हो गए या विलुप्त हो गए, क्योंकि

3. औद्योगीकरण के दौरान परम्परागत उद्योगों व औद्योगिक प्रक्रिया पर टिप्पणी लिखिए?

औद्योगीकरण के दौरान, पारंपरिक उद्योगों और औद्योगिक प्रक्रियाओं पर गहरा प्रभाव पड़ा। यह दौर न केवल नवीन तकनीकों और विनिर्माण पद्धतियों का था, बल्कि यह वह समय भी था जब पारंपरिक उद्योगों को नए आर्थिक परिवेश में स्थान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। इस प्रक्रिया की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

1. **पारंपरिक उद्योगों पर प्रभाव**: औद्योगीकरण ने पारंपरिक उद्योगों जैसे कि हस्तकरघा वस्त्र उद्योग, कुम्हारी, लोहारी, और अन्य हस्तशिल्पों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला। बड़े पैमाने पर उत्पादन और सस्ते औद्योगिक माल ने पारंपरिक उत्पादों के बाजार को कम कर दिया, जिससे कई पारंपरिक शिल्पकारों को अपने पेशे छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

2. **कार्य प्रणाली में परिवर्तन**: औद्योगिक क्रांति ने कार्य प्रणाली में बड़े परिवर्तन किए। पहले जहां शिल्पकार अपने घरों या छोटी-छोटी कार्यशालाओं में काम करते थे, वहीं अब वे बड़े औद्योगिक संस्थानों में मजदूर के रूप में काम करने लगे। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कार्य के प्रति उनके संबंध में बदलाव लाया।

3. **तकनीकी विकास**: औद्योगिक प्रक्रिया में नवाचार और तकनीकी विकास ने उत्पादन की गति और क्षमता को बढ़ाया। यह पारंपरिक उद्योगों की तुलना में अधिक मात्रा में उत्पादन करने में सक्षम बना।

4. **बाजार और विपणन**: औद्योगिक उत्पादों के लिए विस्तृत बाजार विकसित हुए। रेलवे, शिपिंग और विज्ञापन जैसे आधुनिक विपणन और परिवहन तंत्र ने उत्पादों को दूर-दूर तक पहुंचाने में मदद की।

5. **सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन**: औद्योगीकरण ने समाज में वर्गीकरण को और भी स्पष्ट किया। उद्योगपति और मजदूर वर्ग के बीच आर्थिक अंतर बढ़ा। इसने श्रमिक आंदोलनों और सामाजिक न्याय की मांग को भी जन्म दिया।

6. **पर्यावरणीय प्रभाव**: औद्योगीकरण ने पर्यावरण पर भी प्रभाव डाला। बड़े पैमाने पर कच्चे माल की खपत, औद्योगिक कचरे और धुएँ ने पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दिया।

इस प्रकार, औद्योगीकरण के दौरान पारंपरिक उद्योगों और औद्योगिक प्रक्रियाओं में आए परिवर्तनों ने न केवल उत्पादन और कार्य संस्कृति में बदलाव किया, बल्कि समाज और पर्यावरण पर भी गहरे और दीर्घकालिक प्रभाव डाले।

4. औद्योगीकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था में आये परिवर्तन लिखिए?

औद्योगीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे और स्थायी परिवर्तन किए। इस प्रक्रिया का प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में देखा गया, जिसमें उत्पादन, रोजगार, बाजार विकास, शहरीकरण, और आर्थिक नीतियों में मूलभूत परिवर्तन शामिल हैं। निम्नलिखित कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था में औद्योगीकरण के कारण आए:

1. **औद्योगिक विकास**: औद्योगीकरण ने भारत में विभिन्न नए उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहित किया। इससे विनिर्माण क्षेत्र में विविधता और विस्तार हुआ, जिसमें वस्त्र, इस्पात, सीमेंट, रसायन, और फार्मास्यूटिकल्स जैसे उद्योग शामिल हैं।

2. **रोजगार के अवसर**: औद्योगीकरण ने नए रोजगार के अवसर सृजित किए, खासकर शहरी क्षेत्रों में। इसने ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन को भी प्रोत्साहित किया, जिससे शहरी जनसंख्या में वृद्धि हुई।

3. **आर्थिक विकास**: औद्योगीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास को गति दी। विनिर्माण क्षेत्र के विकास से GDP में वृद्धि हुई, और देश की आर्थिक संरचना में विविधता आई।

4. **आयात-निर्यात**: औद्योगीकरण ने भारत को विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाया। निर्यात उन्मुख उद्योगों का विकास हुआ, और भारत विभिन्न उत्पादों का एक महत्वपूर्ण निर्यातक बन गया।

5. **आर्थिक नीतियाँ**: औद्योगीकरण ने भारतीय सरकार को विभिन्न आर्थिक नीतियों और योजनाओं को लागू करने के लिए प्रेरित किया, जैसे कि औद्योगिक नीति प्रस्तावना, विनिर्माण उद्योगों के लिए सब्सिडी और प्रोत्साहन, और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए नीतिगत सुधार।

6. **शहरीकरण और सामाजिक परिवर्तन**: औद्योगीकरण ने शहरीकरण को बढ़ावा दिया और सामाजिक संरचना में परिवर्तन किया। शहरों का विकास, नए शहरी केंद्रों का निर्माण, और जीवनशैली में परिवर्तन सामाजिक और आर्थिक धरातल पर दिखाई दिए।

7. **प्रौद्योगिकी और नवाचार**: औद्योगीकरण ने प्रौद्योगिकी और नवाचार में वृद्धि को प्रोत्साहित किया। नई तकनीकों का अवलंबन और अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश ने उत्पादन प्रक्रियाओं को अधिक कुशल और लागत प्रभावी बनाया।

इन परिवर्तनों ने मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था से एक औद्योगिक और सेवा-प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर धकेला, जिससे देश की आर्थिक प्रगति में तेजी आई।

5. औद्योगीकरण से भारतीय सूत्री वस्त्र उद्योग में क्या बदलाव आए?

औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने भारतीय सूती वस्त्र उद्योग में महत्वपूर्ण बदलाव किए। इसने उत्पादन के तरीकों, श्रम बाजार, उद्योग की वित्तीय संरचना, और वैश्विक बाजारों में इसकी प्रतिस्पर्धी स्थिति को प्रभावित किया। नीचे भारतीय सूती वस्त्र उद्योग में औद्योगीकरण से आए कुछ महत्वपूर्ण बदलावों का वर्णन किया गया है:

1. **तकनीकी नवाचार और उत्पादकता में वृद्धि**: औद्योगीकरण ने तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा दिया, जिससे उत्पादन की प्रक्रिया में कुशलता और उत्पादकता में वृद्धि हुई। यह मुख्यतः ऑटोमेशन और मशीनीकरण के माध्यम से संभव हुआ, जिससे पारंपरिक हस्तनिर्मित विधियों की जगह उच्च गति वाली मशीनें आ गईं।

2. **उत्पादन क्षमता में वृद्धि**: नई तकनीकों के अपनाने से वस्त्र उद्योग की उत्पादन क्षमता में काफी वृद्धि हुई। यह उद्योग अब बड़े पैमाने पर और कम समय में वस्त्रों का उत्पादन करने में सक्षम हो गया।

3. **गुणवत्ता में सुधार**: मशीनीकरण और बेहतर उत्पादन तकनीकों के परिणामस्वरूप वस्त्र उत्पादन में गुणवत्ता में सुधार हुआ। इससे भारतीय वस्त्रों की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

4. **रोजगार संरचना में बदलाव**: औद्योगीकरण से वस्त्र उद्योग में रोजगार की संरचना में बदलाव आया। जहां पहले हस्तनिर्मित प्रक्रियाओं पर अधिक निर्भरता थी, वहीं अब मशीनों के संचालन और रखरखाव के लिए कुशल श्रमिकों की मांग बढ़ी।

5. **बाजार विस्तार**: औद्योगीकरण ने भारतीय वस्त्र उद्योग को विश्व बाजार में बेहतर ढंग से प्रतिस्पर्धा करने में मदद की। उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता में वृद्धि से निर्यात में भी बढ़ोतरी हुई।

6. **पूंजीगत निवेश और वित्तीय नवाचार**: औद्योगीकरण ने वस्त्र उद्योग में पूंजीगत निवेश और वत्तीय नवाचारों को बढ़ावा दिया। नई तकनीकों और मशीनों की खरीद के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता थी, जिससे उद्योग में पूंजीगत गहराई आई।

ये बदलाव भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को न केवल घरेलू बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक मजबूत स्थान प्रदान करने में सहायक रहे हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न

1. इंग्लैण्ड में कारखानों का उदय कब हुआ? इससे उत्पादन प्रक्रिया में क्या परिवर्तन आए?

इंग्लैंड में कारखानों का उदय 18वीं सदी के अंत में हुआ, जो औद्योगिक क्रांति के दौरान हुआ था। इस समय के दौरान, विशेष रूप से 1760 से 1840 के बीच, उत्पादन प्रक्रिया में मौलिक परिवर्तन आए जिसने पूरी दुनिया के उद्योगिक परिदृश्य को बदल दिया। इन परिवर्तनों के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. **मशीनीकरण**: पहले जहाँ हाथ से या साधारण उपकरणों की सहायता से उत्पादन होता था, वहीं कारखानों के उदय के साथ ही मशीनों का उपयोग शुरू हुआ। इससे उत्पादन की गति और मात्रा में भारी वृद्धि हुई।

2. **केंद्रीकृत उत्पादन**: उत्पादन की प्रक्रियाएँ जो पहले विभिन्न स्थानों पर बिखरी हुई थीं, अब कारखानों में केंद्रित हो गईं। इससे उत्पादन की प्रक्रिया में सुधार हुआ और प्रबंधन आसान हो गया।

3. **लेबर मार्केट में परिवर्तन**: कारखानों के उदय ने श्रमिकों की मांग में वृद्धि की। इसने ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर विशाल पलायन को प्रोत्साहित किया।

4. **उत्पादन की विधि में बदलाव**: कारखानों के आगमन ने श्रम विभाजन और विशेषज्ञता को बढ़ावा दिया। श्रमिक अब उत्पादन की पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं थे, बल्कि विशिष्ट कार्यों पर केंद्रित थे।

5. **उत्पादन की लागत में कमी**: मशीनीकरण और श्रम विभाजन के कारण उत्पादन की लागत में कमी आई। इसने वस्तुओं को सस्ता बना दिया, जिससे उपभोक्ता के लिए उनकी पहुँच आसान हो गई।

6. **नई उद्योग शाखाओं का उदय**: कारखानों के उदय ने नई उद्योग शाखाओं को जन्म दिया, जैसे कि टेक्सटाइल, इस्पात, और कोयला उद्योग। इससे उद्योगिक विविधता में वृद्धि हुई।

7. **सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन**: कारखानों के उदय ने समाज के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में गहरे परिवर्तन किए। इसने शहरीकरण, श्रमिक वर्ग के उदय, और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित किया।

2. प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में लघु उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा? विस्तार से वर्णन कीजिए।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद, भारत में लघु उद्योगों पर कई प्रभाव पड़े। यह एक समय था जब भारत ने अपने स्वतंत्रता की कड़ी मेहनत के बाद हासिल की थी और उसने उद्यमिता की ओर बढ़ने का प्रयास किया था।

1. **आर्थिक पुनरारंभ**: प्रथम विश्व युद्ध के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनरारंभ करने की आवश्यकता थी। लघु उद्योगों ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि ये अर्थव्यवस्था के निर्माण में मदद करते थे।

2. **रोजगार का संदर्भ**: लघु उद्योगों ने रोजगार के अवसर प्रदान किए। इन उद्योगों में काम करने वाले लोगों के लिए नौकरी के अवसर उपलब्ध हो गए, जिसने रोजगार के स्तर में सुधार किया।

3. **सामाजिक एवं आर्थिक सुधार**: लघु उद्योगों ने समाज में आर्थिक सुधार लाया। इन उद्योगों के माध्यम से लोगों को नौकरी मिली, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।

4. **स्थानीय विकास**: लघु उद्योगों ने स्थानीय स्तर पर उत्पादन की सुविधा प्रदान की। ये उद्योग स्थानीय बाजारों को समृद्धि दिलाने में मदद करते थे।

5. **प्रौद्योगिकी विकास**: लघु उद्योगों ने प्रौद्योगिकी विकास को गति दी। इन उद्योगों में नवीनतम प्रौद्योगिकी का उपयोग किया गया जिससे उत्पादन प्रक्रिया में सुधार हुआ।

6. **उत्पादन और विपणन की सुविधा**: लघु उद्योगों ने उत्पादन और विपणन की सुविधा प्रदान की। ये उद्योग सामान्य लोगों के लिए उत्पादों को उपलब्ध कराने में मदद करते थे।

7. **आर्थिक विकास**: लघु उद्योगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि को बढ़ावा दिया। ये उद्योग अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।

इस प्रकार, प्रथम विश्व युद्ध के बाद, भारत में लघु उद्योगों का महत्वपूर्ण स्थान था जिसने अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

3. औद्योगीकरण से आप क्या समझते है? विस्तार से व्याख्या कीजिए?

औद्योगिकरण एक प्रक्रिया है जिसमें उद्योग और उत्पादन की प्रक्रियाएं मशीनों और तकनीक के सहायता से समर्पित होती हैं। इस प्रक्रिया में, मानव श्रम की बजाय मशीनों और तकनीकी प्रणालियों का उपयोग किया जाता है जिससे उत्पादन की गति और अधिकतम संभावनाएं होती हैं।

औद्योगिकरण का मुख्य उद्देश्य उत्पादन की वृद्धि, उत्पादकता की बढ़ोतरी, उत्पादन प्रक्रियाओं की अधिकतम संभावनाओं का उपयोग करना, और उत्पादों की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार करना होता है। इसके अलावा, औद्योगिकरण से उत्पादन की लागत में कमी, उत्पादन की स्थायिता और गुणवत्ता में सुधार, नवाचार और प्रौद्योगिकी के विकास, और अधिक उत्पादन क्षमता की संभावना होती है।

औद्योगिकरण के परिणामस्वरूप, उद्योगीकरण अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन लाता है। यह समाज, अर्थव्यवस्था, और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है, जैसे कि नौकरी के अवसरों में परिवर्तन, उत्पादन की वृद्धि, और विशेषज्ञता में बदलाव।